तीन महीने के उपरान्त प्लास्टर कट गया और मुझे याद नही कि मुझे उस पास के स्कूल में मेरा बड़ा भाई मुझे टाट पर बिछा आता था शायद ये सोचकर कि शायद कुछ समय के लिए घर से बाहर हो जाएगा क्योंकि मैं बोलने बहुत लग गया था कभी तो वो ऐसे स्कूल फेंकर आता था जैसे किसी भारी भरकम पत्थर को फेंका जाता था।
जानना चाहते है कि उस समय की जिन्दगी क्या थी? एक तो मुझे पढ़ाई से प्यार हो गया था। इसलिए मैं हर ताने और हर कष्ट को सहकर भी आगे पढ़ना चाह रहा था। उस समय के स्कूल स्कूल स्कूल न होकर बल्कि एक नाममात्र की संस्थाएं होती थी मैं अपनी जिन्दगी के वो दिनजानता हूँ कि जब मुझे अधिक समय बैठे रहने और पेशाब आने के दर्द शुरू हो जाता था तो मैं धीरे-धीरे उसे कपड़ो में ही कर देता था और उसे सुखने के लिए घन्टों में अपनी जगह नहीं छोड़ता था। अपनी मुश्किले किसी से नहीं कहता था क्योंकि मैं जानता था कि अगर मै मुश्किले बताऊंगा तो मुझे पढ़ाई से उठा लिया जाएगा .......इसी प्रकार शरीर को कई चीजे सहने की आदत पड़ गई पर मैं किसी भी हालत मे पढ़ाई छोड़ना नहीं चाहता था।
उर्मिला
एक भावपूर्ण बहन भाई की रोचक कहानी समाज हर वक्त गलत नजरों से देखता रहा
समाज इतना गलत कैसे हो सकता है मुझे जवानी से ही की प्यास पर यह प्यास मेरी पूरी कभी नहीं हो सकती न आज —--कल बहन का प्यार नहीं मिल सका न अपने से न बेगाने से ।
1977 और 72 के बीच में जब मैं अपने से बड़ी एक लड़की से बहन जैसा प्यार करता था --- हर एक को समझने में बहुत देर लग गई थी
आज वह इस दुनिया में नहीं है ---- सिर्फ यादें हैं सिर्फ यादें जिन्हें भिगोकर रख गया ।
अँधेरे - उजाले
अंधेरे-उजाले मेरी ज़िंदगी के उन क्षणों को याद कराते हैं जो क्षण कभी उदासी में तो कभी बहुत मुस्कुराते हुए बीतते थे। हर इंसान की ज़िंदगी में कभी अंधेरा तो कभी उजाला ज़रूर आता है पर इसे हर इंसान को बखूबी सहन करने की आदत रखनी चाहिए।
अंधेरा मेरी ज़िंदगी में तब आया जब मैं अंधेरे को पहचानता ही नहीं था, यानी मैं मात्र दो - ढाई वर्ष का था जब मेरी दोनों टाँगे पूर्णतः चली गई। ज़िंदगी भर मस्त रहते हुए मैं इस अंधेरे को दूर करता रहा। फिर यह अंधेरा मेरी ज़िंदगी में उजाला बन गया। यही कारण है की इस पुस्तक में मैंने काव्य के माध्यम से अंधेरे व उजाले दोनों पर लिखा।
मेरी ज़िंदगी के कुछ अंश भी इसमें डाले गये हैं। ये शायद आपको अच्छे लगेंगे।
ख़ामोशी
इस काव्य संग्रह 70 और 80 के दशक में कविताएं लिखी थी -- का प्रकाशन भारतीय विकलांग कल्याण संस्था तथा दिल्ली दूरदर्शन ज्ञानदेव मंडल द्वारा दोनों संस्थाओं ने मिलकर प्रकाशन किया इस पुस्तक में काफी कविताएं आयोजनों में सुनाई --- प्रशंसा की गई-- विकलांगता के कारण एक निराशा भी मेरे साथ जिंदगी में चलती रहती थी- कभी-कभी मेरी कविताओं में निराशावादी था - निराशावादी जन्म लेता था . एक हसरत है
जिंदगी को समझता था और मेरी एक कविता थी -- खामोश रात एक खामोश जिंदगी है - खामोश जिंदगी है पहली पंक्तियां की ---- जिंदगी - - हैं --- उस समय भी मुझे लगता था विकलांगता ने मेरी जिंदगी को बहु दिल कर दिया है तभी मैं इसके इस तरह की कविताएं लिखता था इस पुस्तक के उपरांत मेरी जिंदगी में एक नई सुनहरी वक्त ने जन्म लिया
-मैं खुश भी था - उदास भी था -- दोनों मेरे साथ साथ चलते रहे --मेरी कार्यशाला थी ---साहित्य उजागर करने वाला था --- काम अधिक पर-- मैं जिंदगी से कभी हारा नहीं मैं अपने कामों में लगा रहा-खुशी है कि यह डिजिटल में पुस्तक छप रही है - इसे अधिक से अधिक लोग पड़ेंगे -- समझेंगे --जिंदगी के विषय में कुछ ज्ञान हासिल होगा एक ही समय में मैं ना जाने कितने काम करता था - कहीं विकलांग कल्याण के काम होते थे-- कहीं साहित्य के काम होते थे --सारा दिन बैंक में मेरे काम होते थे और इस तरीके से मैं विकलांग खेलों में भी इंटरेस्ट रहता था और मैं जिंदगी को खुशहाल करने के लिए पर्यटन करता रहता था मैं अपने प्रयत्नों में सफल भी हुआ --मेरी कविताएं समाज को कुछ देकर जाती है।
जब मैं मर जाऊं
A poetry book by Praveen Bahal
दिशा
A poetry book by Praveen Bahal
रिश्ता
A novel by Praveen Bahal
भूली बिसरी बातें
A story book by Praveen Bahal
ठुकराती राहें
उसकी राह में फूल ही फूल बिछे थे... मदहोश कर देने वाली सुगन्ध बिखरी पड़ी थी... अनिता की बाहों में बाँहें डाले वह जिन्दगी के मीठे नगमे गा रहा था परन्तु एक मोड़ के पश्चात वह राह बदल गई। अब जिस दर्दनाक राह पर वह खड़ा था... वह ठुकराती राह थी... वह राहें बदलता रहा परन्तु राहें उसे ठुकराती रहीं। यह सिलसिला बढ़ता ही गया.. और आज उसे महसूस हुआ कि वह राह का राही नहीं बल्कि राह का वह पत्थर है, जिसे गुजरते राही ठोकर मार कर आगे बढ़ जाते हैं।
इसी उपन्यास में से....